Friday, April 12, 2024
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One Nation-One Election : पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी कमिटी ने ‘एक देश एक चुनाव’ को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की

One Nation-One Election : पिछले साल 2 सितंबर को, 18 हजार से अधिक पेजों की एक रिपोर्ट के लिए एक कमिटी का गठन किया गया था, जिसने एक्सपर्ट्स के साथ चर्चा की। उन्होंने चर्चा के बाद सिर्फ 191 दिनों में रिपोर्ट तैयार कर दी थी। इस बार, पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी कमिटी ने ‘एक देश एक चुनाव’ को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की, जिसमें 18626 पेजों की अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में कई सुझाव शामिल हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि लोकसभा और विधानसभा के उपरांत सिर्फ 100 दिनों के भीतर ही निकाय चुनाव भी करा लिए जाएं। रिपोर्ट में पहले चरण में लोकसभा और विधानसभा को जोड़ने का सुझाव दिया गया है, और दूसरे चरण में नगर पालिकाओं और पंचायतों को लोकसभा और विधानसभा चुनाव के साथ इस प्रकार से जोड़ने की बात की गई है।

One Nation-One Election: ‘एक देश, एक चुनाव’ क्यों है जरूरी

भारत में चुनावों के खर्च में एक विशेष वृद्धि देखने को मिल रही है। लोकसभा चुनाव 2019 ने इस बढ़ती ट्रेंड को अधिकतम उचाई पर ले जाया। उस समय सेटर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुसार, इस चुनाव में 55 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि चुनावों के खर्च में वृद्धि हो रही है और इसे कंट्रोल करने की जरूरत है। क्या भारत में सभी विभागों के चुनाव, जैसे लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव, एक साथ किए जा सकते हैं? इस मुद्दे पर विचार और बहस संविधान सभा से लेकर आज तक जारी है।

आजादी के बाद, कई बार सभी चुनाव एक साथ हो चुके हैं, लेकिन इसके बाद, कुछ दशकों बाद लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने का संघर्ष बढ़ गया है। पिछले साल, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने अब अपनी रिपोर्ट को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है।

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इस रिपोर्ट में क्या-क्या सिफ़ारिशें की गई हैं, इसे समझना ज़रूरी है…

जब पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को दस्तावेज सौंपे जा रहे थे, तो वे दोनों ने भारत के लिए वन नेशन, वन इलेक्शन की नई दिशा तय कर रहे थे। पिछले साल 2 सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति कोविंद की अगुवाई में बने पैनल ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें लिखा था कि संविधान संशोधन के पहले चरण में लोकसभा और सभी विधानसभा चुनाव एक साथ हों। इसके लिए राज्यों की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।

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One Nation-One Election: वन नेशन वन इलेक्शन की चुनौतियां

  • संविधान संशोधन के दूसरे चरण में संविधान संशोधन के साथ लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव होंगे।
  • स्थानीय निकाय चुनाव 100 दिनों के अंदर लोकसभा, विधानसभा के साथ होंगे।
  • अनुच्छेद 324A में संशोधन की जरूरत होगी। कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी चाहिए। 
  • कोविंद कमेटी ने तीन स्तरीय चुनाव के लिए मतदाता सूची की सिफारिश की है। 
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि चुनाव निष्पादित हों, अनुच्छेद 325 में संशोधन की आवश्यकता है। 
  • मध्यावधि चुनाव के बाद गठित होने वाली संसद का कार्यकाल बचा हुआ कार्यकाल के बराबर होगा। 
  • कोविंद कमेटी ने 47 राजनीतिक दलों से सलाह ली है। 
  • 32 दल एक साथ सारे चुनावों के पक्ष में हैं, लेकिन कांग्रेस और टीएमसी सहमत नहीं हैं। 
  • सभी राजनीतिक दलों के सहमति के लिए चुनाव संशोधन की आवश्यकता है।
  • नये संविधान संशोधन के साथ चुनाव प्रक्रिया में सुधार होंगे। 

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‘एक देश, एक चुनाव’ से क्या फायदे हो सकते हैं, जिनके लिए इतनी कवायदें की गईं….

  1. हर साल देश में लगभग पांच से छह चुनाव होते हैं, जिनका बजट और खर्च अत्यधिक होता है।
  2. यह चुनाव अस्थिरता और अनिश्चितता की स्थिति को बढ़ाते हैं, जो स्थानीय निकाय चुनावों के साथ होती है।
  3. इससे सप्लाई चेन, निवेश और आर्थिक विकास में बाधा आती है, जिससे समृद्धि में देरी होती है।
  4. चुनावी प्रक्रिया में बाधा के कारण सरकारी कामों में रुकावट आती है, जो विकास को प्रभावित करती है।
  5. इससे सरकारी व्यवस्था में बाधा बढ़ती है, और लोगों को अनिवार्य तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है।
  6. सरकारी अधिकारी और सुरक्षा बल चुनाव ड्यूटी में अपनी ऊर्जा लगाते हैं, जिससे कामों में देरी होती है।
  7. अक्सर आचार संहिता से नीति निर्माण में बाधा पड़ती है, जो विकास के कामों को अवरुद्ध करती है।
  8. इतने चुनाव मतदाताओं को थका देते हैं, और उनका समय चुनावी प्रक्रिया में गुजरता है।
  9. इससे सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ती है, जो समृद्धि को धीमा करती है।
  10. सरकारी नीतियों के निर्माण में देरी आती है, जिससे लोगों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा में असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।

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2019 का लोकसभा चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव था..

भारत में चुनाव लगभग हर बार महंगे होते हैं, विशेषकर 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर. सेटर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुसार, उस समय लगभग 55 हजार करोड़ रुपये खर्चे गए थे, जानकारों का मानना है की चुनावी गतिविधियों के बजट का स्तर काफी ऊँचा था। इसीलिए, चुनावों के फैले हुए दायरे को संभालना महत्वपूर्ण होता है। क्या भारत में सभी तरह के चुनाव, यानी लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय आदि चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं. यह सवाल संविधान सभा की बैठकों और बहसों के दिनों से आज तक चर्चा में बना हुआ है.

आज़ादी के बाद कई बार सभी चुनाव एक साथ हुए, लेकिन उसके लगभग दो दशक बाद जिस तरह लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का सुर-ताल बिगड़ा, तब से यह बहस और तेज़ होती चली आ रही है. पिछले साल पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई में बनी कमेटी ने अब अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है.

1967 के चौथे आम चुनाव तक केंद्र और राज्य के चुनाव साथ होते थे…

One Nation-One Election: भारत में चुनावों के खर्च का स्तर बहुत ऊंचा हो गया है। लोकसभा चुनाव 2019 इसका एक उच्च उदाहरण था, जो दुनिया में सबसे महंगा चुनाव माना जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, इस चुनाव में लगभग 55 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इसे देखते हुए यह माना जा सकता है कि चुनावों के खर्च की स्थिति चिंताजनक है और उसे संभालने की आवश्यकता है।

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